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अनुनासिक संज्ञा : संज्ञा प्रकरण
SANSKRITJAGAT 19/02/2021 | 10:21 PM
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१. मुखनासिकावचनोऽनुनासिकः ।। ल.कौ. ९ । अष्टा. १.१.८ ।।
वृत्ति : मुखसहितनासिकयोच्चार्यमाणो वर्णोऽनुनासिकसंज्ञः स्यात् ।
तदित्थम् – अ इ उ ऋ एषां वर्णानां प्रत्येकमष्टादश भेदाः । लृवर्णस्य द्वादश तस्य दीर्घाभावात् । एचामपि द्वादश तेषां ह्रस्वाभावात् ।
अर्थ : मुख और नासिक दोनों से बोला जाने वाला वर्ण अनुनासिक कहलाता है । इस तरह से अ इ उ व ऋ स्वरों में से प्रत्येक के १८ भेद हैं । लृ वर्ण के १२ भेद हैं क्यूँकि इसका दीर्घभेद नहीं होता है । इसी तरह ए‚ ऐ‚ ओ तथा औ के भी बारह–बारह भेद होते हैं क्यूॅंकि इनके ह्रस्व भेद नहीं होते हैं ।
टिप्पणी - ङ‚ ञ‚ ण‚ न तथा म ये पाँच अनुनासिक वर्ण हैं । इनके अतिरिक्त सभी वर्णों के साथ इनके योग होने पर सभी वर्णों का (र को छोड़कर) अनुनासिक भेद हो जाता है । इनके योगाभाव में सभी वर्ण निरनुनासिक या अननुनासिक कहे जाते हैं ।
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